Tuesday, June 23, 2020

सच्चा रक्षक कौन?

नमस्कार दोस्तों
आज हम अपने ब्लॉग में बात करेंगे सच्चे रक्षक की जो रक्षक हर मुसीबत से हमें बचाता है जिसने हमें जन्म से पहले मां के गर्भ में भी आहार दिया उसने ऐसी व्यवस्था की कि मां की नाल से हमारे नाल को जोड़ा और उससे हमें भोजन प्राप्त होता रहा और हम 9 महीने गर्भ में रहे उसके बाद बाहर आने पर भी हमारे भोजन की व्यवस्था की मां के स्तनों में दूध आने से हमारी परवरिश हुई और हम बड़े हुए फिर हमें भोजन दिया जिसे खाकर हम इतने बड़े और मजबूत हुए कि हम हर काम करने के लिए सक्षम हुए।

 क्या माता पिता हमारे सच्चे रक्षक है।

मां ने हमें अपने गर्भ से जन्म दिया तथा हमारा पालन पोषण भी करती है हमें दूध पिलाती है खाना खिलाती है हमारा पूरा ध्यान रखती है हमारे पिता भी हमारे लिए धन कमाते हैं तथा हमारी सभी जरूरतों को पूरा करते हैं वह भी हमारे रक्षक हैं लेकिन पूरी तरह से हमारी रक्षा वह नहीं कर सकते वह हमें मृत्यु से नहीं बचा सकते अब अगर हमें कोई बीमारी हो जाती है तो वह हमें डॉक्टर के पास ले जाते हैं और उनसे जितना हो सकता है वह उतना हमारे लिए करते हैं परंतु वह हमारे कर्मों को नहीं काट सकते जो हमारे कर्म में लिखा है वह तो हमें भोगना ही पड़ेगा माता पिता ने हमें जन्म दिया है यह उनका उपकार है हम पर और इस उपकार का हम बदला कभी नहीं चुका सकते परंतु वह भी हमारे पूर्ण रक्षक नहीं है।

क्या भगवान हमारे सच्चे रक्षक है।

भगवान हमारे सच्चे रक्षक है परंतु कौन से भगवान हमारे सच्चे रक्षक है जो मंदिर में रहते हैं वह या जो हमने घर में रखे हैं वो या ब्रह्मा विष्णु महेश या माता दुर्गा इन सब में बड़ा कौन है जो हमारी पूर्ण रक्षा कर सकता है कोई कहता है श्री राम भगवान बड़े हैं वह सब की रक्षा करते हैं परंतु उनका स्वयं का जीवन तो बहुत कठिनाइयों में बीता था उन्हें 14 वर्ष का वनवास भोगना पड़ा और उसके बाद राज्य मिला भी तो कोई सुख नहीं मिला फिर कोई कहता है श्री कृष्ण जी बड़े हैं वह हमारे रक्षक हैं परंतु श्री कृष्ण जी तो विष्नु भगवान के अवतार थे श्री कृष्ण जी ने बहुत सारी लीलाएं भी की परंतु कर्मों का दंड तो श्री कृष्ण भगवान भी नहीं काट सकते अगर श्री कृष्ण भगवान आयु बढ़ा सकते हैं या कर्मों का दंड काट सकते तो श्री रामचंद्र के जन्म में जिस बाली को उन्होंने छुप कर मारा था उसी बाली के हाथों कृष्ण जन्म में नहीं मरना पड़ता इसका अर्थ साफ है कि श्री कृष्ण भगवान और श्री राम दोनों ही हमारे पूर्ण रक्षक नहीं है।
 और अगर भगवान ब्रह्मा विष्णु महेश की शक्ति के विषय में कहा जाए तो यह भी सोलह कलाओं के भगवान हैं और इनकी भी जन्म मृत्यु होती है इसका प्रमाण श्रीमद् देवी भागवत में लिखा हुआ है तथा इनकी साधना करने वाले योगियों को भी पूर्ण गति नहीं मिलती यह कि केवल कर्मों का फल ही दे सकते हैं क्योंकि ब्रह्मा जी की साधना हिरनाकश्यप ने की थी उसका भी बुरा अंत हुआ शिव जी के साधना रावण ने की थी उसका अंत भी बुरा हुआ इसलिए यह तीनों देवता भी पूर्ण रक्षक नहीं है।

आखिर हमारा पूर्ण रक्षक कौन है?

हमारा पूर्ण रक्षक वह परमात्मा है जिसने हमें माता के गर्भ में भी भोजन दिया और माता के गर्भ से निकलने के बाद हमारे लिए दूध की व्यवस्था की तथा हमारे लिए अन्न जल अन्य की व्यवस्था की तथा कदम कदम पर वह परमात्मा हमारी रक्षा करता है। हमें हर मुसीबत से बचाता है वह परमात्मा हमारे पाप कर्म  को भी काट सकता है हमारे कर्मों में लिखे लेख को मिटा कर हमारे जीवन में खुशियां भर सकता है तथा अंत में हमारे मृत्यु के बाद भी हमें पूर्ण मोक्ष करा सकता है वह हमारा साथ कभी नहीं छोड़ता हर पल हर क्षण हमारे साथ रहता है वह है हमारा पूर्ण सच्चा रक्षक।

वह पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी है जो हमारे पूर्ण रक्षक है।
पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब ही है उन्होंने ही  इस संपूर्ण सृष्टि की रचना की है। इसकी अधिक जानकारी के लिए आप पुस्तक "ज्ञान गंगा" मंगवा सकते हैं या हमारी वेबसाइट www.jagatgururampalji.org
पर भी प्रमाण देख सकते हैं।
कबीर साहिब जब कलयुग में धरती पर आए थे तो उन्होंने बहुत से चमत्कार किए थे जैसे सिकंदर लोदी का जलन का रोग ठीक किया था । उनके गुरु रामानंद जी को जब सिकंदर लोदी ने तलवार से काट दिया तो कबीर साहिब ने उन्हें पुनः जीवित किया था। सर्वानंद की मां शारदा का भी रोग ठीक किया था। कमाल तथा कमाली को जो कि मुर्दा थे उनको जीवित किया था। सिकंदर लोदी की सभा में कटी हुई गाय को पुनर्जीवित किया था ।वह गाय गर्भवती भी थी। सेउ कीगर्दन काटे जाने पर उसे भी पुनर्जीवित किया था। इस तरह से कबीर परमेश्वर जब धरती पर आए थे तो उन्होंने अनेकों चमत्कार किए थे अपने भक्तों के अनेक रोग और कष्ट दूर किए थे जो भक्त गरीब थे उन्हें धन देकर उनकी गरीबी दूर की थी जो रोग से ग्रस्त थे उन्हें रोग मुक्त किया था ।
क्योंकि भगवान तो वह होता है -
जो अंधे को आंख देत कोढ़िन को काया
 बाँझन को पुत्र देत और निर्धन को माया।
 इस प्रकार कबीर परमेश्वर ही हमारे सच्चे रक्षक है।

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Wednesday, June 17, 2020

कृष्ण जन्मोत्सव

कृष्ण जन्मोत्सव को जन्माष्टमी भी कहते हैं इस दिन श्री कृष्ण जी ने अपनी माता देवकी के गर्भ से जन्म लिया था पर कंस के अत्याचारों से बचाने के लिए पिता वासुदेव उन्हें वृंदावन में यशोदा और नंदराम जी को दे आए उन दोनों ने ही उनका पालन पोषण किया।

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं जो द्वापर युग में आए थे भगवान विष्णु 16 कलाओं के भगवान है। इनकी शक्ति सीमित है यह अपने भक्तों को कर्म का फल  ही दे सकते हैं परंतु उनके पापकर्म नहीं काट सकते हैं उनकी उम्र नहीं बढ़ा सकते हैं क्योंकि उम्र तो केवल पूर्ण परमात्मा ही बढ़ा सकते हैं और वही हमारे पाप कर्मो को भी काट सकते हैं। क्योंकि परमात्मा सब कुछ कर सकते हैं।


श्री कृष्ण जी ने बहुत सी लीला की जो इस प्रकार है-

👉श्री कृष्ण जी ने कंस को मारकर उसके अत्याचारों से जनता को मुक्त किया।

👉श्री कृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को महल बनवा कर दिया तथा उन्हें धन देकर उनकी गरीबी को दूर किया।

👉 श्री कृष्ण ने मोरध्वज के पुत्र ताम्रध्वज को फिर से जीवित किया।

👉 श्री कृष्ण ने द्रौपदी का चीर बढ़ाकर भरी सभा में उसकी उसकी इज्जत बचाई।

👉 कुरुक्षेत्र में गीता का ज्ञान बोला।

और भी अनेक लीलाएं हैं जिनसे सभी परिचित हैं परंतु कुछ ऐसी बातें जो आप को नहीं मालूम है उस पर हम कुछ विचार करेंगे।

कुछ विचारणीय बातें -

👉श्री कृष्ण जी ने तो माता के गर्भ से जन्म लिया था जबकि पूर्ण परमात्मा को गर्भ का दुख नहीं होता वह किसी मां के गर्भ से जन्म नहीं लेता और ना ही उनकी मृत्यु होती है लेकिन श्री कृष्ण भगवान की तो मृत्यु हुई थी।

👉 श्री कृष्ण जी ने अपने मित्र सुदामा को एक मुट्ठी चावल के बदले महल बनवा कर दीया जबकि परमात्मा ने तैमूर लंग को एक रोटी के बदले 7 पीढ़ियों का राज दे दिया था।

👉  श्री कृष्ण जी मोरध्वज के पुत्र ताम्रध्वज को तो जीवित कर दिया था परंतु अपने ही भांजे अभिमन्यु को जीवित नहीं कर पाए थे क्योंकि मोरध्वज के पुत्र ताम्रध्वज की आयु शेष थी परंतु अभिमन्यु की आयु शेष नहीं थी श्री कृष्ण जी आयु नहीं बढ़ा सकते हैं केवल पिछले कर्म का फल ही दे सकते हैं।

👉द्रोपदी का चीर भी पूर्ण परमात्मा ने ही बढ़ाया था।
एक बार द्रौपदी ने अंधे महात्मा को अपनी साड़ी के कपड़े में से टुकड़ा दिया था क्योंकि अंधे महात्मा की कोपीन पानी में बह गई थी। साधु ने आशीर्वाद अनंत चीर पाने का आशीर्वाद दिया। परमात्मा ने चीरहरण में द्रौपदी का चीर बढ़ाकर लाज बचाई।

👉ये 33 प्रमाण जो सिद्ध करते हैं कि गीता ज्ञान श्रीकृष्ण ने नही दिया ।

श्रीमद्भगवद्गीता जी का अनमोल यथार्थ पुर्ण ब्रम्ह ज्ञान
(गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित)

1. मैं सबको जानता हूँ, मुझे कोई नहीं जानता (अध्याय 7 मंत्र 26)

2 . मै निराकार रहता हूँ (अध्याय 9 मंत्र 4 )

3. मैं अदृश्य/निराकार  रहता हूँ (अध्याय 6 मंत्र 30) निराकार क्यो रहता है इसकी वजह नहीं बताया सिर्फ अनुत्तम/घटिया भाव कहा है ।

4. मैं कभी मनुष्य की तरह आकार में नहीं आता यह मेरा घटिया नियम है (अध्याय 7 मंत्र 24-25)

5.पहले मैं भी था और तू भी सब आगे भी होंगे (अध्याय 2 मंत्र 12) इसमें जन्म मृत्यु माना है ।

6. अर्जुन तेरे और मेरे जन्म होते रहते हैं (अध्याय 4 मंत्र 5)

7. मैं तो लोकवेद में ही श्रेष्ठ हूँ (अध्याय 15 मंत्र 18)
लोकवेद =सुनी सुनाई बात/झूठा ज्ञान

8. उत्तम परमात्मा तो कोई और है जो सबका भरण-पोषण करता है (अध्याय 15 मंत्र 17)

9.उस परमात्मा को प्राप्त हो जाने के बाद कभी नष्ट/मृत्यु नहीं होती है (अध्याय 8 मंत्र 8,9,10)

10. मैं भी उस परमात्मा की शरण में हूँ जो अविनाशी है (अध्याय 15 मंत्र 5)


11. वह परमात्मा मेरा भी ईष्ट देव है (अध्याय 18 मंत्र 64)

12. जहां वह परमात्मा रहता है वह मेरा परम धाम है वह जगह जन्म - मृत्यु रहित है (अध्याय 8 मंत्र 21,22) उस जगह को वेदों में ऋतधाम, संतो की वाणी में सतलोक/सचखंड कहते हैं । गीताजी में शाश्वत स्थान कहा है ।

13. मैं एक अक्षर ॐ हूं (अध्याय 10 मंत्र 25 अध्याय 9 मंत्र 17 अध्याय 7 के मंत्र 8 और अध्याय 8 के मंत्र 12,13 में )

14. "ॐ" नाम ब्रम्ह का है (अध्याय 8 मंत्र 13)

15. मैं काल हूं (अध्याय 10 मंत्र 23)

16.वह परमात्मा ज्योति का भी ज्योति है (अध्याय 13 मंत्र 16)

17. अर्जुन तू भी उस परमात्मा की शरण में जा, जिसकी कृपा से तु परम शांति, सुख और परम गति/मोक्ष को प्राप्त होगा (अध्याय 18 मंत्र 62)

18. ब्रम्ह का जन्म भी पूर्ण ब्रम्ह से हुआ है (अध्याय 3 मंत्र 14,15)

19. तत्वदर्शी संत मुझे पुरा जान लेता है (अध्याय 18 मंत्र 55)

20. मुझे तत्व से जानो (अध्याय 4 मंत्र 14)

21. तत्वज्ञान से तु पहले अपने पुराने /84 लाख में जन्म पाने का कारण जानेगा, बाद में मुझे देखेगा /की मैं ही इन गंदी योनियों में पटकता हू, (अध्याय 4 मंत्र 35)

22. मनुष्यों का ज्ञान ढका हुआ है (अध्याय 5 मंत्र 16)
:- मतलब किसी को भी परमात्मा का ज्ञान नहीं है

23. ब्रम्ह लोक से लेकर नीचे के ब्रम्हा/विष्णु/शिव लोक, पृथ्वी ये सब पुर्नावृर्ति(नाशवान) है ।

24. तत्वदर्शी संत को दण्डवत प्रणाम करना चाहिए (तन, मन, धन, वचन से और अहं त्याग कर आसक्त हो जाना)  (अध्याय 4 मंत्र 34)

25. हजारों में कोई एक संत ही मुझे तत्व से जानता है (अध्याय 7 मंत्र 3)

26. मैं काल हु और अभी आया हूं (अध्याय 10 मंत्र 33)
तात्पर्य :-श्रीकृष्ण जी तो पहले से ही वहां थे,

27. शास्त्र विधि से साधना करो, शास्त्र विरुद्ध साधना करना खतरनाक है (अध्याय 16 मंत्र 23,24)

28. ज्ञान से और श्वासों से पाप भस्म हो जाते हैं (अध्याय 4 मंत्र 29,30, 38,49)

29. तत्वदर्शी संत कौन है पहचान कैसे करें :- जो उल्टा वृक्ष के बारे में समझा दे वह तत्वदर्शी संत होता है (अध्याय 15 मंत्र 1-4)

30. और जो ब्रम्हा के दिन रात/उम्र बता दें वह तत्वदर्शी संत होता है (अध्याय 8 मंत्र 17)

31. 3 भगवान बताये गये हैं गीताजी में
•क्षर , अक्षर, परमअक्षर
(•ब्रम्ह, परब्रह्म, पूर्ण/पार ब्रम्ह
•ॐ, तत्, सत्
•ईश, ईश्वर, परमेश्वर)

32. गीता जी में तत्वदर्शी संत का इशारा > 18.तत्वदर्शी संत वह है जो उल्टा वृक्ष को समझा देगा. (अध्याय 15 मंत्र 1-4)

 "कबीर अक्षर पुरुष एक पेड़ है, निरंजन वाकी डार। तीनों देव शाखा भये, पात रुप संसार।। "

    33. जो ब्रम्ह के दिन रात /उम्र बता देगा वह तत्वदर्शी संत होगा, (अध्याय 8 के मंत्र 17)

 इस प्रकार से सिद्ध होता है कि श्री कृष्ण जी से भी बड़े कोई पूर्ण परमात्मा है जिन की पूर्ण जानकारी हमें तत्वदर्शी संत द्वारा ही प्राप्त हो सकती है।

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Tuesday, June 2, 2020

परमेश्वर की लीलाएं


 आज से करीब 600 साल पहले कबीर साहेब कमल के फूल पर लहरतारा नामक तालाब में शिशु के रूप में प्रकट हुए थे तथा उन्होंने बहुत सी लीलाएं की थी जिसका वर्णन इस प्रकार है-


कबीर साहेब द्वारा सर्वानंद को शरण में लेना
पंडित सर्वानंद ने अपनी माँ से कहा कि मैंने सभी ऋषियों को शास्त्रार्थ में हरा दिया है तो मेरा नाम सर्वाजीत रख दो लेकिन उनकी माँ ने सर्वानंद से कहा कि पहले आप कबीर साहेब को शास्त्रार्थ में हरा दो तब आपका नाम सर्वाजीत रख दिया जाएगा। जब सर्वानंद कबीर साहेब के पास शास्त्रार्थ करने पहुँचे तो कबीर साहेब ने कहा कि आप तो वेद-शास्त्रों के ज्ञाता हैं मैं आपसे शास्त्रार्थ नहीं कर सकता। तब सर्वानंद ने एक पत्र लिखा कि शास्त्रार्थ में सर्वानंद जीते और कबीर जी हार गए। उस पर कबीर साहेब जी से अंगूठा लगवा लिया। लेकिन जैसे ही सर्वानंद अपनी माँ के पास जाते तो अक्षर बदल कर कबीर जी जीते और पंडित सर्वानंद हार गए ये हो जाते। ये देखकर सर्वानंद आश्चर्य चकित हो गए और आखिर में हार मानकर सर्वानंद ने कबीर साहेब की शरण ग्रहण की।


सम्मन को पार करना
सम्मन बहुत गरीब था। जब कबीर परमात्मा का भक्त बना। तब परमात्मा के आशीर्वाद से दिल्ली का महान धनी व्यक्ति हो गया, परंतु मोक्ष की इच्छा नहीं बनी।
सम्मान ने अपने परमेश्वर रूप सतगुरु के लिए अपने बेटे की कुर्बानी की थी। जिस कारण अगले जन्म में नौशेरखान शहर के राजा के घर जन्मा। फिर ईराक देश में बलख नामक शहर का राजा अब्राहिम सुल्तान बना। परमात्मा ने उस आत्मा के लिए अनेकों लीलाएं की और उसका उद्धार किया।


दादू जी का उद्धार
सात वर्ष की आयु के दादू जी को परमात्मा कबीर जी जिंदा महात्मा के रूप में मिले व ज्ञान समझाया और सतलोक दिखाया।
इसलिए परमात्मा कबीर जी की महिमा गाते हुए दादू  जी कहते हैं :-
जिन मोकूं निज नाम दिया, सोई सतगुरु हमार ।
दादू दूसरा कोई नहीं, कबीर सिरजनहार ।।


मीरा बाई को शरण में लेना
मीरा बाई पहले श्री कृष्ण जी की पूजा करती थी। एक दिन संत रविदास जी तथा परमात्मा कबीर जी का सत्संग सुना तो पता चला कि श्री कृष्ण जी नाशवान हैं। समर्थ अविनाशी परमात्मा अन्य है। संत रविदास जी को गुरू बनाया। फिर अंत में कबीर जी को गुरू बनाया। तब मीरा बाई जी का सत्य भक्ति बीज का बोया गया।
गरीब, मीरां बाई पद मिली, सतगुरु पीर कबीर। 
देह छतां ल्यौ लीन है, पाया नहीं शरीर


 यह कुछ उदाहरण हमने आपके सामने प्रस्तुत किए हैं।
इस प्रकार कबीर परमेश्वर ने अनेकों लीलाएं की एवं बहुत सारे महापुरुषों को अपनी शरण में ले कर उनका उद्धार भी किया तथा हमारे लिए अभी तक भक्ति को जीवित रखा और इस बिचली पीढ़ी के लिए असली मंत्रों को बचा कर रखा वर्तमान समय में संत रामपाल जी महाराज कबीर परमेश्वर के अवतार धरती पर आए हुए हैं उनसे नाम दीक्षा लेकर सभी को अपना कल्याण करवाना चाहिए।
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